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सतुआन पर श्रद्धालुओं ने गंगा में लगाई आस्था की डुबकी,सतुआन को क्यों खाते हैं सत्तू, जाने इस रिपोर्ट में ….

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रिपोर्ट तारकेश्वर प्रसाद

आरा।हिंदू सनातन धर्म एवं भारतीय संस्कृति का प्राचीनतम पर्व सतुआन किसानों के लिए सौगातों वाला त्योहार है। वैशाख में रवि की फसल की कटान एवं घर में नई फसल की आवक की दोहरी सौगात से किसान आह्लादित होते हैं। आज के दिन जौ, चना से निर्मित सत्तू, पुदीना, नींबू, नए फल, कच्चे आम की चटनी, गुड़ सहित अनेक औषधियुक्त भोज्य पदार्थ सतुआन की शोभा बढ़ाते हैं। हर घर में संकल्प करने के बाद लोगों ने सतुआ का सेवन कर सतुआन पर्व को धूमधाम से मनाया।

वही भोजपुर में सतुआन के मौके पर जगह- जगह लोगों ने गंगा नदी, तालाबों एवं अन्य नदियों में स्नान के साथ ही स्थानीय मंदिरों में पूजा अर्चना अर्चना कर सतुआन मनाया. आरा के आरण्य देवी, बुढ़वा महादेव, सिद्धनाथ मन्दिर, पातालेश्वर नाथ मंदिर, में जहां पूजा के लिए भीड़ लगी वही बड़हरा, महुली, सिन्हा सहित गंगा के तटवर्तीय इलाकों में दिनभर गंगास्नान के लिए लोग की भीड़ उमड़ते रहे. बखोरापुर मन्दिर में भी दूर दराज से लोगों ने पहुंच पूजा की. श्रद्धालुओं ने पूजा के साथ ही सत्तू,आम, गुड और नगदी के साथ मिट्टी के बर्तन ब्राह्मणों को दान में दिए.

चने की नई फसलों का उत्सव हैं सतुआन

सतुआन अप्रैल महीने की संक्रांति यानी मेष संक्रांति को मनाया जाता है. सूर्य के मकर राषि से मेष राशि में पहुंचने के उपलक्ष्य में यह लोक पर्व मनाया जाता है. सतुआन आम के वृक्षों में लगे नए फलों और जौ, चने की नई फसलों का उत्सव होता है. इस दिन किसान नई फसलों के लिए प्रकृति का धन्यवाद प्रकट करते हैं. इस दिन की शुरुआत आम और सत्तू के सेवन से होती है. ईश्वर को भोग भी इन्हीं खाद्य सामग्रियों का लगाया जाता है.आम की नई फसल यानी आम के टिकोरे की चटनी बनती है. उसे चने के सत्तू के साथ खाया जाता है. सत्तू बिहारियों का सबसे प्रिय भोजन है. इसे बिहारी फास्ट फूड भी कह सकते हैं. ऐसा फास्ट फूड, जिसका किसी भी तरह का साइडइफेक्ट नहीं होता. एक गिलास सत्तू पानी, नींबू और नमक के साथ पी लिजिए फिर देखिए.वैसे तो सत्तू चने का हीं होता है ।लेकिन कई जगहों पर मिक्स सत्तू का सेवन करते हैं. इनमें चने का सत्तू, जौ का सत्तू और मकई का सत्तू. सत्ते के कुछ यार दोस्त भी होते हैं. जैसे प्याज, अचार, चोखा और चटनी. जहां चार यार मिल जाते हैं तो महफिल बन जाती है, वैसे हीं सत्तू के भी चार यार जहां मिल जाएं, वहां बिहारी जम जाता है. भागदौड़ करना है तो एक गिलास सत्तू काफी है भाई. बचपन में सुनने में आता था कि सत्तू पीने से स्मरण शक्ति बढ़ती है, पढ़ने में मन लगता है. पेट ठंडा रहता है. थोड़ा सी उम्र बढ़ी तो पता चला कि इससे पौरुष बढ़ता है. अब पौरुष तो खांटी हिंदी शब्द था, मतलब पता नहीं था लेकिन मस्तिष्क की ज्ञान गंगा हिलोरे मारती रहती थी कि पौरुष का मतलब कुछ तो हट के होता है.

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